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सृजनशीला सेवा समिति

हुनर को हथियार बनाएं, बेरोजगारी को दूर भगाएं

 

देश के सामने शिक्षितों को रोजगार एक बड़ी समस्या है। इसका एक बड़ा कारण रोजगार योग्य कुशल स्नातक और स्नातकोत्तर देने में हमारी शिक्षा प्रणाली पिछड़ी हुई है।

शिवम भारद्वाज 
सर्जनशीला सेवा समिति

देश में बेरोजगारी की समस्या दूर करना चाहते हैं तो शिक्षा के बारे में दृष्टिकोण बदलना आवश्यक है। असल में हमारी शिक्षा प्रणाली डिग्री तो देती है, पर इससे रोजगार सुनिश्चित नहीं होता। हुनर ही एक ऐसा हथियार है, जो निश्चित रूप से किसी को भी रोजगार लायक बनाकर आजीविका कमाने में मदद करता है। देश में रोजगार योग्य हुनर के जानकारों की कमी अब भी एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। इसलिए देश के सामने शिक्षितों को रोजगार एक बड़ी समस्या है। इसका एक बड़ा कारण रोजगार योग्य कुशल स्नातक और स्नातकोत्तर देने में हमारी शिक्षा प्रणाली पिछड़ी हुई है।
दुनिया में भारत ही एक ऐसा देश है, जिसकी 64 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु वर्ग की है। वैश्विक बाजार में युवा कामगारों की मांग भी बहुत है, पर 90 प्रतिशत नौकरियां कुशलता पर आधारित हैं। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में मात्र 4.7 प्रतिशत कामगार औपचारिक रूप से कुशल हैं। चीन में 24 प्रतिशत, अमरीका में 52, इंग्लैंड में 68, जर्मनी में 75, जापान में 80 और दक्षिण कोरिया में 96 फीसदी कामगार कुशल हैं। 'नेशनल पॉलिसी ऑफ स्किल डेवलपमेंट एंड एंटरप्रेन्योरशिप-2015Ó के मुताबिक 2022 के अंत तक 40 करोड़ लोगों को हुनरमंद करने का केंद्र सरकार का लक्ष्य था, पर अभी तक लगभग 4 करोड़ लोग ही विभिन्न कौशल में प्रशिक्षित हो पाए हैं। रोजगारदाताओं की जरूरत और नौकरी चाहने वालों के कौशल के बीच मेल होने से औद्योगिक गतिविधियों में भी बाधा रही है। कुशल कामगारों की मांग और उनकी उपलब्धता के बीच बड़ी खाई बनी हुई है। पूरा असंगठित क्षेत्र अर्र्ध-कुशल या अकुशल श्रमिकों पर निर्भर है। पूर्ण कुशल श्रमिकों की कमी की वजह से इनकी मांग ज्यादा है और उन्हें वेतन भी अच्छा मिलता है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआइई) की एक रिपोर्ट के मुताबिक लगभग 29 प्रतिशत प्रशिक्षित युवा बेरोजगार हैं, क्योंकि उनकी रोजगार पाने की क्षमता बेहतर नहीं है।




मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में विश्व स्तर पर मुकाबले के कारण, हम किसी भी परिस्थिति में गुणवत्ता और उत्पादन लागत से समझौता नहीं कर सकते। असंगठित क्षेत्र के कारखानों में काम करने वाले अर्ध-कुशल श्रमिक उत्पादन में समय भी अधिक खपाते हैं और तैयार माल की गुणवत्ता भी बेहतर नहीं होती। कुशलता की कमी सीधी हमारी शिक्षा प्रणाली से जुड़ी है। स्कूली स्तर से ही बच्चों को किसी कुशलता की ओर मोडऩे की जरूरत है, जिससे कि उच्च शिक्षा की ओर आगे बढऩे वाले बच्चों को स्कूली शिक्षा के बाद रोजगार पाने में कोई मुश्किल हो। यदि कोई बढ़ई, प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन या ब्यूटीशियन बनना चाहता है, तो उसे कम से कम विश्व स्तर का प्रमाणित कौशल प्राप्त करना होगा। इसके लिए हरेक स्कूल में शिक्षा के साथ कौशल प्रशिक्षण केंद्र हो। उच्च स्तर के कौशल के लिए राज्यों में कौशल विश्वविद्यालयों की स्थापना की जाए।

हमारी नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में उच्च शिक्षा संस्थानों में वर्ष 2035 तक 3.50 करोड़ नई सीटों के साथ व्यावसायिक शिक्षा का अनुपात 50 प्रतिशत तक करने का लक्ष्य है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति व्यावसायिक शिक्षा को मुख्यधारा की शिक्षा के साथ जोडऩे और सही प्रमाणीकरण के साथ उन्हें रोजगार लायक बनाने पर जोर देती है। इसके लिए आइआइटी और आइआइएम के बराबर कई विषयों की शिक्षा और अनुसंधान विश्वविद्यालय (एमईआरयू ) स्थापित किए जाएंगे। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के मुताबिक वर्ष 2050 तक कम से कम 50 प्रतिशत विद्यार्थियों के पास स्कूल और उच्च शिक्षा के माध्यम से व्यावसायिक अनुभव भी होगा। लक्ष्य यही है कि प्रत्येक बच्चे को कम से कम एक कौशल में पारंगत होना चाहिए, ताकि वह बेरोजगार रहे।
नई शिक्षा नीति कुशलता और शैक्षणिक शिक्षा को अलग करके नहीं देखती। देश के सभी बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा जरूरी है, जिसमें पहली से कक्षा बारहवीं तक की कौशल विद्या भी शामिल है। वोकेशनल स्किल कोर्स शुरू होने से हर साल लाखों स्कूल 'ड्रॉप आउट' को रोजगार की मुख्यधारा में शामिल किया जा सकेगा। असंगठित क्षेत्र के उद्योगों में गांवों और कस्बों के अकुशल श्रमिक अधिक हैं। यह सुनिश्चित करने की सख्त जरूरत है कि इन कामगारों की कुशलता भी बेहतर की जाए। कुशल कामगारों की पहचान करने के लिए राज्य सरकार के रोजगार कार्यालयों को ब्लॉक स्तर पर प्राइवेट सेक्टर के साथ साझेदारी करनी चाहिए। 'हर हाथ को काम' के लिए उन्हें सही कुशलता प्रदान करना जरूरी है।

 

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